गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

आज का समाज

आज का समाज। आज के बदलते समाज और लोगो के बारे में सब आये दिन पढ़ते  और हाँ देखते भी है उसी पर कुछ पंक्त्तियां।

है जो आज का भारतीय समाज,
समझ से परे इसका मिज़ाज !
संस्कृति पर बढ़ती छाया काली,
शिक्षा पर छार्इ पश्चिमी प्रणाली !
हुवा स्वार्थी जीवन और व्यवहार
मुल्येविहीन हुवे आचार और विचार !
ईमानदारी छोड़ भ्रष्ट आय का अंधार्जन,
प्रभु दर्शन छोड़, गंदे नाच गाने का दर्शन !
अब भटकती संस्कृति का मात्र विस्मरण,
कहाँ है श्रवण, प्रहलाद और दानवीर कर्ण !

रविवार, 1 जून 2014

"मुझे कोई नहीं शिकायत"


छाई है आज मुझपे आफत, हाँ छाई है आज मुझपे आफत,
जाना है आज मुझे मिट,छोड़ रहा हूँ मै आपके नाम ये ख़त !

मुझे कोई नहीं शिकायत, तुमसे ओ मानव जीव, 
तुम ही पाले, तुमने ही रखी मेरी नींव !

मै ही नादान सपनो में खोकर, बढ़ता गया अपनी नींव छोड़कर,
और आज खड़ा हूँ तुम्हारी ही राह रोककर !

मान बेठा विधाता को अपना रचनाकार,भूल गया तुम्हारे वो अनेक उपकार,

सपने


मन में रंग बिरंगे सपने,

कई अपनों के, कई अपने,

पूर्णता की आशा से परे,


नन्हे मन में घरोंदा करे !


जैसे ही तारे लेके आती रात,

गुपचुप मन से करते बात,

मन लेके सुख दुःख का बोझ,

समाके रखता इनको रोज !

शनिवार, 31 मई 2014

"परिवार प्रेम"

दुनियां में कौन सच्चा कौन अच्छा ?
जग में जगमग हँसते दिखे कई चहरे,
पर, चंद के चाल के भाव समझ से परे,
कुछ को पाया अपने ही कलाप में घिरे
और अन्य की  आँखों में दिखे राज गहरे !  
 
सांझ को पंहुचा घर तो पाया,
माँ की आँखों में ममता की लहरे,
पीता के भाव सागर से गहरे,
सजनी का श्रृंगार दिल में ठहरे,
नन्हो की किलकारियां कानों की करती पहरे !

रविवार, 6 अप्रैल 2014

कुछ पल हमें भी आजमाओं

हसीनाओं के लिए ख़ास ---- और नए दौर के आशिको के लिए भी !!

कितने ही आशिको ने वादें तोड़े चाँद लाने के,
अपनाते ये पुराना नुस्खा आपको पटाने के
चाँद तो आज भी जगमगाता नील गगन में 
बिन सोचे हसीनाएं खो जाती प्रीत लगन में,
अब तो संभलो, परखो ऐ सुन्दर हसीनाओं,
पूरा नही सही, पर कुछ पल हमें भी आजमाओं !!!!!!!!!!