कुछ लोग भारत में एकाएक डरने
लगे है ! कुछ पुरस्कार वापस देना चाहते है ! तो मेरा कुछ ऐसा कहना है !
अतीत में सहे है
हमने,
आतंक के हमले
घोटालों के जुमले
गंदगी, गुंडे व् चेले,
तब तो किसी ने नहीं लौटायें,
पुरस्कार के थैले !!
अब क्यों चला रहे है जहर के तीर,
'अतुल्य भारत' को किया गंभीर,
'सत्यमेव जयते' को दिया चीर,
कुछ अमीर बन गए है आमीर,
क्योंकि हिन्दुस्तां ने धर रखा है
धीर,
सह रहा है "प्रथम प्रधान
सेवक" वीर
सह रहा है "हर
हिंदुस्तानी" फकीर !!
वक्त है खिंच लो बोल-चाल पर
लकीर
नहीं तो धीर धरा पर धरकर,
टूट पड़ेंगे कुटने भारत के जवान वीर !!
---आनन्द दाधीच "मंजुषा"
(बैंगलोर)
(आमिर (उर्दू) का मतलब राजा होता
है)
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